अंधेरगर्दी

आम आदमी का दर्द ......

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दीपक पाण्डेय


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जुगाड़ : समस्या का तत्काल समाधान ….part 1

Posted On: 4 Feb, 2011  
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गब्बर सिंह का ऑरकुट प्रोफाइल : very interesting

Posted On: 3 Feb, 2011  
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ये कैसा चाहतों का सिलसिला है ……..”valentine contest”

Posted On: 1 Feb, 2011  
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Others लोकल टिकेट में

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तनख्वाह का दिन : जानू..

Posted On: 31 Jan, 2011  
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मस्ती मालगाड़ी लोकल टिकेट में

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बस यही बाकि था ….(kids belt)

Posted On: 27 Jan, 2011  
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Others मस्ती मालगाड़ी में

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सहयोग : कहीं देखा है ऐसा …….

Posted On: 24 Jan, 2011  
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Others मस्ती मालगाड़ी मेट्रो लाइफ में

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पत्नी पत्नी होती है ………

Posted On: 21 Jan, 2011  
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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

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अच्छी जानकारी, और भलीभांति समझाकर प्रस्तुत किया आपने पांडेय जी । गूगल ट्रांस्लिटर सचमुच अच्छा और हिन्दी लेखन के लिये सबसे लोकप्रिय साफ़्टवेयर है । परन्तु मैंने देखा कि इसके प्रयोगकर्त्ता फ़ेसबुक आदि पर हिन्दी में नहीं लिख पाते । जबकि मैं जो फ़ोनेटिक हिन्दी राइटर इस्तेमाल करता हूं, उससे किसी भी साइट और अपने डेस्कटाप तक पर हिन्दी बड़ी आसानी से लिख पाता हूं । गूगल देवनागरी का पूर्णविराम नहीं मानता, अन्तर्राष्ट्रीय डाट से ही पूर्णविराम का काम लेना पड़ता है । जबकि फ़ोनेटिक राइटर से आप देखिये कि उसी डाट को दबाने पर मैं मौलिक पूर्णविराम दे पा रहा हूं । इसी प्रकार गूगल के साथ हर कहीं लैंगुएज बार का पुछल्ला पीछे पड़ा रहता है, जो हर पेज पर डिस्टर्ब करके रखता है । राइटर के साथ ऐसी कोई बात नहीं । हरे रंग का 'अ' सिस्टम ट्रे में पड़ा रहता है, जिसे जब चाहे आन आफ़ कर लें । फ़ाइल का साइज भी एमबी के बजाय कुछ सौ केबी का ही है, जो सेकंड्स में डाउनलोड होता है । रीजनल एन्ड लैंगुएजेज में मात्र एकबार जाकर सेटिंग्स को दुरुस्त करना होता है, और आवश्यकतानुसार सीडी डालनी होती है । बाक़ी कुछ नहीं करना पड़ता, सबकुछ डेस्कटाप के सफ़ेद 'अ' आइकन में ही मौज़ूद है । यह सब कुछ ऐसे कारण हैं, जो मेरे हिसाब से इस साफ़्टवेयर को गूगल वाले से बेहतर साबित करते हैं । धन्यवाद ।

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के द्वारा: दीपक पाण्डेय दीपक पाण्डेय

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दीपकजी, कार्टून हों या चुटकुले (जोक्स) इनका व्यंग्य अत्यंत चुटीला और असरदार होता है मैं मानता हूँ की हिंदी साहित्य में अभी भी अछे व्यंग्यकारों की कमी है. सिर्फ चंद लोग हुए हैं उनमें भी खालिस राजनितिक व्यंग्य लिखने वाले थोड़े ही हैं बहरहाल परसाईजी, श्रीलाल शुक्ल, ज्ञान चतुर्वेदी, प्रदीप पन्त, के. पी. सक्सेना, शरद जोशी, रविन्द्र कालिया अदि व्यंग्यकारों ने जो कुछ इस दिसा में योगदान दिया है वो किसी भी भाषा के लिए गर्व की बात है जाहिर है आप जैसे उदीयमान लेखकों से हिंदी को बहुत आशाएं है. उदहारण के तौर पर जागरण जंक्सन में एक ब्लाग " भाईजी कहिन" होता है जो वास्तव में काफी अछे स्तर का व्यंग्य लेखन है.

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प्रिय श्री दीपक जी, आपके इस ब्‍लॉग पर आया तो मन में था कि ताजा पोस्‍ट पढूँगा और टिप्‍पणी दे दूँगा। लेकिन पढ़ते-पढ़ते 11 पोस्‍ट पढ़ गया:- ■इंतज़ार की प्यास है ■हर ख्वाहिश तेरे बगैर : \"valentine कांटेस्ट\" ■परीक्षा में फ़ैल होने के तरीके: जबरदस्त ■लडकियों के जवाब जब आप प्रेम निवेदन करे. valentine contest ■जुगाड़ : समस्या का तत्काल समाधान ....part 1 ■गब्बर सिंह का ऑरकुट प्रोफाइल : very interesting ■ये कैसा चाहतों का सिलसिला है ........valentine contest ■तनख्वाह का दिन : जानू.. ■मैं और मेरे मोबाइल..(खीज) ■बस यही बाकि था ....(kids belt) वेलेंटाइन कांटेस्‍ट के लिए लिखी गई कविताएं बहुत सुंदर हैं। आप इस कविता को भी कांटेस्‍ट का हिस्‍सा बना सकते थे। खैर अभी भी मौका है। हास्‍य का पिटारा है आपका ब्‍लॉग जो बोलते चित्रों से काफी कुछ कह जाता है। सभी पोस्‍टे एक से बढ़कर एक हैं। बहुत अच्‍छे। अरविन्‍द पारीक

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के द्वारा: Deepak Sahu Deepak Sahu

के द्वारा: rahul kumar (Bijupara,Ranchi) rahul kumar (Bijupara,Ranchi)

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आप अपने इसी सोचने के अलग अंदाज़ के लिए जाने जाते हैं. परन्तु हमारे झारखण्ड में नक्कासली अगर कहते है की वोट का बहिष्कार करो वर्ना हम मार काट फैलायेंगे तो क्या हम डर कर घर बैठ जाये. अगर हम वोट न दे तो शांति रहेगी पर इस शांति की क्या कीमत है आप तो बखूबी जानते होंगे. मै ना बीजेपी की पैरवी नहीं कर रहा न ही मै मानता हु की बीजेपी कांग्रेस से बहुत बेहतर है पर इस शांति की क्या फायदा . वैसे मेरा लेख तिरंगा यात्रा का समर्थन में नहीं है. परन्तु जिस तरह से दमन किया उस को लेकर है. ८४ लाख लेकर ट्रेन बुक करवाई उसे वापस भेज दिया. रोकने के लिए ऐसे खड़े थे जैसे ............. वैसे बाकि मुद्दों को आपने अनछुआ छोड़ दिया . आप ही सही समीक्षा कर सकते थे. मै तो अपने बाल मन की व्यथा लिख रहा हु. आप का आशीर्वाद मुझे प्रेरित करता है. शुक्रिया.

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दीपक जी ...नमस्कार ! मैं इस हक में नही हूँ की किसी भी बहाने से या फिर राजनीती के चलते देश ही नही बल्कि पूरे विश्व के सबसे सवेदनशील इलाके का माहौल बिगाड़ा जाए .... सभी जानते है की जब भी चौथा और अंतिम विश्वयुद्ध होगा तों वोह कश्मीर के मुद्दे को लेकर भारत पाक की लड़ाई से ही शुरू होगा ...... इससे पहले जब अतीत में कांग्रेस ने फारुक अब्दुल्ला की बजाय जी. एम्. शाह. की सरकार बनवा दी थी तों पूरे दस साल तक यह शांत घाटी अशांत रही थी ..... इसलिए अब दुबारा से ऐसी कोई भी गलती नही होनी चाहिए .... अगर वहां का माहौल अशांत होता है तों हमको पूरे विश्व में हरेक मंच पर पाक के अर्नगर्ल आरोपों का सामना करना पड़ता है और बेवजह निचा दिखना पड़ता है .... बाकी आगे आप खुद समझदार है

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के द्वारा: Piyush Pant, Haldwani Piyush Pant, Haldwani




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